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दर्दनाक: ज़हरीली शराब खा गई सेंकडो जिंदगियां। कितनी औरतों को बेवा और बच्चों को यतीम कर दिया।

अपने प्यारे को अपनी आंखों के सामने तड़प तड़प कर मरता हुवा देखना कितना भयावह और दर्दनाक होता है, ये मन्जर शुक्रवार 8 फरवरी को सहारनपुर चिकित्सालय में देखने को मिला। मृतकों के परिजनों और पीड़ित गाँव के ग्रामीणों ने सपने में भी यह नही सोच होगा कि उनके गाँव और घरों से इस तरह अर्थियां निकलेंगी। कितनी औरतें बेवा हुई और कितने बच्चे यतीम हुवे कुछ पता नही। किसी का भाई गया,किसी का पति,किसी का बेटा गया तो किसी का बाप,,,,,

वह मंजर कभी नही भूलता जब शुक्रवार को सायं 4 बजे में सहारनपुर के जिलाचिकित्सालय के इमरजंसी वार्ड में पहुंचा तो वहां पर लोगो की काफी भीड़ जमा थी। जहां मृतकों के परिजन दहाड़े मार-मार कर रो रहे थे। दूसरी और घटना की जानकारी पर पहुंचे अन्य लोग भी गुमशुम खड़े थे। हालांकि उनके चहरे पर मरने वालों के लिए पीड़ा, और शराब माफियओं और ऐसे लोगो सरक्षण दे रहे प्रशासनिक अधिकारियों के प्रति नफ़रत और गुस्सा साफ तौर पर झलक रहा था। एम्बुलेंस लगातार मरीजों को लेकर पहुंच रही थी उसी तरह लाशें बाहर आ रही थी। जैसी ही लाश के रूप में कोई बॉडी बाहर आती परिजनों की रोने की चित्कार शुरू हो जाती तब देखने वालों के चेहरे पर दोषियों के लिए गुस्सा और नफरत और गहरी हो जाती। लाशें निकलती रही और शवग्रह में जमा होती रही। परिजन अपनी आंखों के सामने अपने प्यारों को तड़प- तड़प करत मरता हुवा देखते रहे। कोई कुछ भी न कर पाया। एक बाद एक लगातार लाशें बाहर आती रही । एक साथ इतनी मौतों ने दिल को चीर कर रख दिया। प्रशासन के हाथ, पांव फूला दिए, पुलिस कर्मी और अस्पताल के कर्मचारियों में भगदड़ सी मची हुई थी। मौके पर पहुंचे पुलिस प्रशासन के आला अधिकारियों को भी जनता के क्रोध का सामना करना पड़ा।

उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में जहरीली शराब ने फिर कहर बरपाया है। सहारनपुर, शामली, कुशीनगर, हरिद्वार, रुड़की सहित कई जगहों पर जहरीली शराब पीने से बड़ी संख्या में लोग मारे गए हैं। अस्पतालों में इलाज करा रहे पीड़ितों की तादाद तो और भी ज्यादा है। सबसे ज्यादा मौतें उत्तरप्रदेश के सहरानपुर और इससे सटे उत्तराखंड के हरिद्वार में हुई हैं। यह घटना बताती है कि उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में जहरीली शराब का कारोबार धड़ल्ले से चल रहा है। जाहिर है, ये राज्य शराब माफिया की गिरफ्त में हैं। स्थानीय प्रशासन और पुलिस तो आंखें मूंदे हुए हैं और किसी पर भी कार्रवाई कर पाने में लाचार है। हमेशा से होता यही आया है कि जब भी इस तरह की घटनाएं होती हैं तो फौरी और रस्मी तौर पर कुछ अधिकारी-कर्मचारी निलंबित किए जाते हैं और मृतकों के परिजनों को मुआवजा देकर पिंड छुड़ा लिया जाता है, लेकिन ऐसी कार्रवाई किसी पर नहीं होती, जिससे कोई सबक ले सके। वही अब भी हुआ है।

जहरीली शराब का कारोबार करने वालों का जाल काफी बड़ा है। जिस तरह यह धंधा चलता आ रहा है उससे तो लगता है कि यह व्यवस्था का हिस्सा बन गया है। और जहरीली शराब ही क्यों, इस तरह के कई अवैध कारोबार होते हैं जिनके बारे में सरकारें, प्रशासन और पुलिस सब जानते हैं, लेकिन उन पर लगाम नहीं लगाते। यह कोई छिपी बात नहीं है कि अवैध शराब का धंधा स्थानीय प्रशासन और पुलिस की मिलीभगत से ही चल पाता है। कच्ची शराब का सेवन आमतौर पर निचले तबके के लोग करते हैं, क्योंकि यह सस्ती होती है और आसानी से मिल जाती है। इसलिए निम्न-वर्गीय बस्तियों, झुग्गी बस्तियों में कच्ची शराब के मटके ज्यादा चलते हैं। पाउचों तक में शराब बिकती है। ग्रामीण इलाकों में कच्ची शराब का कारोबार बड़े पैमाने पर चलता है। पर पुलिस और प्रशासन इन्हें इसलिए चलने देता है, क्योंकि ये धंधे उगाही के बड़े स्रोत होते हैं। जब कोई बड़ा हादसा हो जाता है तो उसे रफा-दफा कर दिया जाता है और थोड़े दिन बाद फिर से धंधा शुरू हो जाता है। ऐसे में स्थानीय प्रशासन कठघरे में आएगा ही।

उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में जहरीली शराब से हुई मौतें बता रही हैं कि इन राज्यों की सरकारों ने सत्ता में आने के बाद शराब माफिया पर डंडा चलाने की हिम्मत नहीं दिखाई, बल्कि शराब माफिया के सामने हाथ खड़े कर दिए। अगर शराब माफिया के खिलाफ अभियान चलता तो लोग मारे जाने से बच सकते थे। शराब की बिक्री राज्य सरकारों के लिए राजस्व का बड़ा स्रोत होती है, लेकिन अवैध शराब का कारोबार करने वालों से जो उगाही होती है, वह भी मामूली नहीं होती। इसलिए चाहे किसी पार्टी की सरकार सत्ता में रहे, शराब माफिया पर इसका कोई असर नहीं पड़ता और इसीलिए अवैध शराब के धंधे पर लगाम नहीं लग पाती। यह कोई पहला मौका नहीं है जब जहरीली शराब के कारण इतनी मौतों की खबर आई हो। चार साल पहले लखनऊ के मलिहाबाद में जहरीली शराब से पैंतीस से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी। लेकिन शर्म की बात तो यह है कि ऐसे बड़े हादसों के बाद भी सरकार की आंखें नहीं खुलतीं। पिछली घटनाओं से भी कोई सबक नहीं लिया जाता। अगर सरकार ठान ले तो जहरीली शराब बेचने वालों का सफाया करना कोई मुश्किल काम नहीं है!

वह मंजर कभी नही भूलता जब शुक्रवार को सायं 4 बजे में सहारनपुर के जिलाचिकित्सालय के इमरजंसी वार्ड में पहुंचा तो वहां पर लोगो की काफी भीड़ जमा थी। जहां मृतकों के परिजन दहाड़े मार-मार कर रो रहे थे। दूसरी और घटना की जानकारी पर पहुंचे अन्य लोग भी गुमशुम खड़े थे। हालांकि उनके चहरे पर मरने वालों के लिए पीड़ा, और शराब माफियओं और ऐसे लोगो सरक्षण दे रहे प्रशासनिक अधिकारियों के प्रति नफ़रत और गुस्सा साफ तौर पर चमक रहा था। जैसी ही लाश के रूप में कोई बॉडी बाहर आती परिजनों की रोने की चित्कार शुरू हो जाती तब देखने वालों के चेहरे पर ये गुस्सा और नफरत और गहरी हो जाती। लाशें निकलती रही और शवग्रह में जमा होती रही। परिजन अपनी आंखों के सामने अपने प्यारों को तड़प- तड़प करत मरता हुवा देखते रहे। कोई कुछ भी न कर पाया। एक बाद एक लगातार लाशें बाहर आती रही । एक साथ इतनी मौतों ने दिल को चीर कर रख दिया। प्रशासन के हाथ, पांव फूल दिए वहीं उन्हें जनता के क्रोध का सामना करना पड़ा।

*ग्रामीण क्षेत्रों में कच्ची शराब के बड़े-बड़े माफियां सक्रिय है क्योंकि कच्ची शराब का अवैध व्यापार ग्रामीण क्षेत्रों में आसानी से फल-फूल जाता है, कच्ची शराब सरकारी मदीरा से बहुत सस्ती होने के कारण मजदूर पिछड़ा तबका शराबनोशी की आदत से मजबूर कच्ची शराब बनाकर बेचने वाले माफियाओं से सस्ती के लालच में खरीदकर पीता है आबकारी विभाग पुलिस विभाग को सब जानकारी रहती है कौन-कौन शराब कसीदगी के व्यापार में संलिप्त है लेकिन कुछ माफियाओं से सेटिंग बनी रहती है और कुछ राजनीतिक दबाव से बचे रहते हैं, लेकिन शासन प्रशासन तो बिलकुल ही इनकी ओर आंख बंद किए रहता है जब इस तरह की कोई भयावह घटना हो जाती है तो तब नींद से जागता है*

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